हरियाणा के शूटिंग परिवार से निकली 22 वर्षीय राइजा ने 10 मीटर एयर राइफल से शुरू किया सफर, 16 साल की उम्र में शॉटगन अपनाकर अब सीनियर एशियन गेम्स डेब्यू के लिए तैयार
हरियाणा के शूटिंग परिवार से निकली 22 वर्षीय राइजा ने 10 मीटर एयर राइफल से शुरू किया सफर, 16 साल की उम्र में शॉटगन अपनाकर अब सीनियर एशियन गेम्स डेब्यू के लिए तैयार
खबर खास | स्पोर्ट्स डेस्क
हरियाणा के शामगढ़ की राइजा ढिल्लों के लिए शूटिंग किसी शूटिंग रेंज से नहीं, बल्कि घर से शुरू हुई। परिवार में पीढ़ियों से शिकार की परंपरा और घर में बंदूकों का होना उनके बचपन का हिस्सा था। पिता ने 12 साल की उम्र में उन्हें शूटिंग आजमाने के लिए प्रेरित किया। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह शौक एक दिन उन्हें भारत की एशियन गेम्स टीम तक पहुंचा देगा।
22 वर्षीय राइजा अब सीनियर महिला स्कीट स्पर्धा में एशियन गेम्स डेब्यू करने के लिए तैयार हैं। उनका लक्ष्य साफ है—पोडियम फिनिश, लेकिन दबाव के बजाय वह इस बड़े मंच के अनुभव का आनंद लेना चाहती हैं।
राइजा ने शुरुआत 10 मीटर एयर राइफल से की थी। कम उम्र में शॉटगन उनके लिए भारी थी, इसलिए माता-पिता और कोच ने पहले राइफल में प्रशिक्षण लेने की सलाह दी। करीब 16 साल की उम्र में उन्होंने शॉटगन का रुख किया और धीरे-धीरे इसी खेल में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी।
उनके पिता, जो व्यवसाय और खेती से जुड़े हैं, बेटी के शूटिंग करियर को लेकर उत्साहित थे। वहीं उनकी मां, जो गांव की सरपंच हैं, शुरुआत में बेटी के आउटडोर खेल को लेकर थोड़ी चिंतित थीं। लेकिन राइजा की लगातार सफलता और खुशी ने उनकी मां का नजरिया भी बदल दिया।
राइजा मानती हैं कि शूटिंग ने सिर्फ उनका खेल नहीं बदला, बल्कि उनका व्यक्तित्व भी बदल दिया। कभी शांत और अंतर्मुखी रहने वाली राइजा अब आत्मविश्वास से भरी हैं। उनके मुताबिक शॉटगन चलाने से मिलने वाला आत्मविश्वास आज भी उन्हें रोमांचित करता है।
2024 में महज 20 साल की उम्र में ओलंपिक कोटा हासिल करने के बाद राइजा पर टीम में अपनी जगह बनाए रखने का दबाव भी रहा। वह मानती हैं कि उस दौर का तनाव मुश्किल था, लेकिन उसी अनुभव ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाया।
अपने सफर में वह कोचों के तकनीकी मार्गदर्शन और माता-पिता के भावनात्मक सहयोग को अहम मानती हैं। राष्ट्रीय शिविरों में बेहतर प्रशिक्षण, कोचिंग, गोला-बारूद और क्ले टारगेट जैसी सुविधाओं के लिए वह NRAI की भी सराहना करती हैं।
अब एशियन गेम्स की बारी है। राइजा का सपना पोडियम पर खड़े होने का है, लेकिन उनका मानना है कि जब वह खेल का आनंद लेती हैं तो प्रदर्शन अपने आप बेहतर हो जाता है। परिवार की विरासत से शुरू हुआ यह सफर अब राइजा की अपनी पहचान और नई विरासत बनाने की ओर बढ़ चुका है।
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