आईएसएस पर चल रहे वैज्ञानिक प्रयोग में पानी और माइक्रोग्रैविटी की मदद से भविष्य की जीवनरक्षक दवाओं के विकास की दिशा में बड़ा कदम
आईएसएस पर चल रहे वैज्ञानिक प्रयोग में पानी और माइक्रोग्रैविटी की मदद से भविष्य की जीवनरक्षक दवाओं के विकास की दिशा में बड़ा कदम
ख़बर ख़ास | नई दिल्ली
धरती से करीब 400 किलोमीटर ऊपर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर भारतीय मूल के अमेरिकी एस्ट्रोनॉट डॉ. अनिल मेनन एक ऐसे वैज्ञानिक मिशन का हिस्सा हैं, जो भविष्य में गंभीर बीमारियों के इलाज का तरीका बदल सकता है। इस मिशन के तहत माइक्रोग्रैविटी यानी बेहद कम गुरुत्वाकर्षण वाले वातावरण में पानी की मदद से दवाओं के लिए आवश्यक विशेष प्रकार के प्रोटीन क्रिस्टल तैयार किए जा रहे हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण के कारण जिन प्रोटीन क्रिस्टलों का निर्माण पूरी तरह सटीक नहीं हो पाता, वही प्रक्रिया अंतरिक्ष में अधिक शुद्ध और व्यवस्थित रूप से संभव होती है। ऐसे उच्च गुणवत्ता वाले क्रिस्टलों का अध्ययन कर वैज्ञानिक नई और अधिक प्रभावी दवाओं के विकास में सफलता हासिल कर सकते हैं।
इस प्रयोग में पानी की अहम भूमिका है। विशेष घोलों में मौजूद प्रोटीन को नियंत्रित परिस्थितियों में पानी के माध्यम से क्रिस्टल के रूप में विकसित किया जाता है। अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव लगभग न होने से ये क्रिस्टल पृथ्वी की तुलना में अधिक बड़े, साफ और बेहतर गुणवत्ता वाले बनते हैं। इनका विश्लेषण कर शोधकर्ता बीमारियों से जुड़े प्रोटीन की संरचना को अधिक सटीकता से समझ सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के अनुसंधान से कैंसर, अल्जाइमर, पार्किंसन और कई दुर्लभ आनुवंशिक रोगों के लिए नई पीढ़ी की दवाएं विकसित करने में मदद मिल सकती है। बेहतर प्रोटीन संरचना की जानकारी मिलने से दवाओं को अधिक प्रभावी और कम दुष्प्रभाव वाला बनाया जा सकेगा।
भारतीय मूल के एस्ट्रोनॉट डॉ. अनिल मेनन इस वैज्ञानिक अभियान के दौरान कई जैविक और चिकित्सा संबंधी प्रयोगों की निगरानी कर रहे हैं। उनका यह मिशन केवल अंतरिक्ष अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा लाभ भविष्य में पृथ्वी पर चिकित्सा विज्ञान और मरीजों के इलाज को भी मिल सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरिक्ष में किए जा रहे ऐसे प्रयोग मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल रहे हैं। यदि यह शोध अपेक्षित परिणाम देता है, तो आने वाले वर्षों में कई जटिल और लाइलाज मानी जाने वाली बीमारियों के लिए अधिक सटीक, सुरक्षित और प्रभावी दवाएं विकसित करना संभव हो सकता है।
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