स्पेसएक्स के ट्रांसपोर्टर-18 मिशन से MOI-1A रवाना; बाढ़, सीमा निगरानी और खेती समेत कई क्षेत्रों में मिलेगी मदद
स्पेसएक्स के ट्रांसपोर्टर-18 मिशन से MOI-1A रवाना; बाढ़, सीमा निगरानी और खेती समेत कई क्षेत्रों में मिलेगी मदद
खबर खास | नई दिल्ली
भारत ने अपना पहला कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस ऐसा उपग्रह लॉन्च किया है, जो पृथ्वी पर कच्चा डेटा भेजने के बजाय अंतरिक्ष में ही तस्वीरों और अन्य डेटा का विश्लेषण कर सकता है। इस तकनीक से सीमा निगरानी, आपदा प्रबंधन और कई अन्य क्षेत्रों में तेजी से जानकारी हासिल करने में मदद मिल सकती है। साथ ही डेटा को पृथ्वी तक भेजने में लगने वाला समय और लागत भी कम होने की उम्मीद है।
हैदराबाद की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कंपनी टेकमी2स्पेस का MOI-1A उपग्रह रात 11:48 बजे स्पेसएक्स के ट्रांसपोर्टर-18 मिशन के जरिए लॉन्च किया गया।
कंपनी के अनुसार, MOI-1A भारत का पहला ऑर्बिटल कंप्यूटिंग सैटेलाइट है। इसके साथ भारत ऐसी क्षमता विकसित करने वाला अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन के बाद दुनिया का चौथा क्षेत्र बन गया है।
परंपरागत रूप से उपग्रह बड़ी मात्रा में तस्वीरें और अन्य डेटा इकट्ठा करते हैं और उन्हें पृथ्वी पर भेजते हैं। इसके बाद ग्राउंड स्टेशन पर इस डेटा को प्रोसेस और विश्लेषित किया जाता है। MOI-1A को इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अंतरिक्ष में ही पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से डेटा का विश्लेषण किया जाएगा और केवल जरूरी व उपयोगी जानकारी ही पृथ्वी पर भेजी जाएगी।
टेकमी2स्पेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रौनक कुमार सामंत राय के अनुसार, अगर कोई उपग्रह 300 गीगाबाइट डेटा इकट्ठा करता है, लेकिन उसमें से केवल 5 गीगाबाइट ही उपयोगी है, तो उपग्रह की कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली जरूरी जानकारी की पहचान कर केवल उसी हिस्से को पृथ्वी पर भेज सकती है।
इस तकनीक का इस्तेमाल बाढ़ की निगरानी, जंगलों की निगरानी, कृषि क्षेत्रों, खनन क्षेत्रों, सीमाओं और भूमि की निगरानी जैसे कार्यों में किया जा सकता है। अंतरिक्ष में ही डेटा को प्रोसेस करने से बैंडविड्थ की जरूरत कम हो सकती है और जानकारी को पृथ्वी तक पहुंचाने में लगने वाला समय भी घट सकता है।
ऑर्बिटल कंप्यूटिंग की यह क्षमता ऐसे मामलों में खास तौर पर उपयोगी हो सकती है, जहां बड़ी मात्रा में डेटा तेजी से इकट्ठा होता है और उसमें से तत्काल उपयोगी जानकारी की पहचान करना जरूरी होता है। इससे उपग्रह से मिलने वाले डेटा को अधिक तेजी से इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ेगी और डेटा ट्रांसमिशन से जुड़ी लागत में भी कमी आ सकती है।
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