सर्वे में बाल स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और बुनियादी सुविधाओं में सुधार दर्ज, लेकिन पोषण, स्तनपान और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को लेकर चिंता बरकरार
सर्वे में बाल स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और बुनियादी सुविधाओं में सुधार दर्ज, लेकिन पोषण, स्तनपान और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को लेकर चिंता बरकरार
खबर खास | नई दिल्ली
शुक्रवार को जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2023-24 (NFHS-6) ने भारत में कई सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार को उजागर किया है। हालांकि, रिपोर्ट में महिलाओं में बढ़ते मोटापे और अंतरंग साथी (पति या पार्टनर) द्वारा की जाने वाली हिंसा जैसी चिंताओं को भी सामने रखा गया है।
सर्वेक्षण के अनुसार, 2019-21 में हुए NFHS-5 की तुलना में महिलाओं में मोटापे की दर 7 प्रतिशत अंक बढ़ गई है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब दुनिया भर में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और बदलती खान-पान की आदतों को लेकर चिंता बढ़ रही है।
रिपोर्ट में उद्धृत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं ने अपने पति या पार्टनर द्वारा मानसिक, आर्थिक या यौन हिंसा का सामना किया है। 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग हर पांच में से एक महिला ने ऐसी हिंसा झेलने की बात कही।
हालांकि, घरेलू हिंसा के मामलों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। घरेलू हिंसा की दर 29.2 प्रतिशत से घटकर 22.3 प्रतिशत रह गई है, जबकि बाल विवाह की दर 23.3 प्रतिशत से घटकर 20.1 प्रतिशत हो गई है।
महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी भी बढ़ी है। यह आंकड़ा 25.4 प्रतिशत से बढ़कर 30.8 प्रतिशत पहुंच गया है। वहीं, महिलाओं में इंटरनेट उपयोग लगभग दोगुना होकर 64.3 प्रतिशत हो गया है, जो डिजिटल पहुंच और कनेक्टिविटी में वृद्धि को दर्शाता है।
सर्वे में महिलाओं के संपत्ति स्वामित्व में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। अब 18.8 प्रतिशत परिवारों में महिलाओं के नाम घर या जमीन है, जबकि 2021 में यह आंकड़ा 14 प्रतिशत था। शहरी क्षेत्रों में यह दर 18.2 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 19.1 प्रतिशत रही।
स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में भी सुधार देखने को मिला है। देश में अब 98.3 प्रतिशत परिवारों के पास बिजली और 96.5 प्रतिशत परिवारों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है।
इसके बावजूद, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े कुछ संकेतक चिंता का विषय बने हुए हैं। जन्म के बाद पहले छह महीनों तक केवल स्तनपान कराने की दर 63.7 प्रतिशत से घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई है। वहीं, निजी अस्पतालों में सीजेरियन डिलीवरी की दर रिकॉर्ड 54.1 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
रिपोर्ट में बाल कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में सकारात्मक प्रगति भी दर्ज की गई है। बच्चों में ठिगनापन (स्टंटिंग) की दर 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत हो गई है। हालांकि, 6 महीने से 2 वर्ष तक के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही संतुलित और पर्याप्त आहार मिल रहा है, जो अब भी एक बड़ी चुनौती है।
आधुनिक परिवार नियोजन साधनों जैसे गर्भनिरोधक गोलियां, कंडोम और नसबंदी का उपयोग 56.4 प्रतिशत से घटकर 52.7 प्रतिशत हो गया है, जिसे लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।
राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, केरल बाल विवाह के मामले में सबसे सुरक्षित राज्य रहा, जहां इसकी दर केवल 2.9 प्रतिशत है। वहीं, पश्चिम बंगाल (36.4 प्रतिशत) और बिहार (34.6 प्रतिशत) में बाल विवाह की दर सबसे अधिक दर्ज की गई।
वैवाहिक हिंसा के मामलों में हिमाचल प्रदेश सबसे बेहतर स्थिति में रहा, जहां इसकी दर केवल 4.3 प्रतिशत है, जबकि बिहार में यह दर सबसे अधिक 36.1 प्रतिशत रही।
महिलाओं में मोटापे के मामले में आंध्र प्रदेश और सिक्किम (48-48 प्रतिशत) सबसे आगे रहे। इनके बाद केरल (46.7 प्रतिशत) का स्थान रहा। दूसरी ओर, मेघालय (13.8 प्रतिशत) और झारखंड (16.9 प्रतिशत) में महिलाओं में मोटापे की दर सबसे कम दर्ज की गई।
NFHS-6 की रिपोर्ट भारत की सामाजिक और स्वास्थ्य स्थिति की मिश्रित तस्वीर पेश करती है। एक ओर कई विकास संकेतकों में सुधार देखने को मिला है, वहीं दूसरी ओर लैंगिक हिंसा, पोषण संबंधी चुनौतियों और जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता बनी हुई है।
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