₹10 और ₹20 के पॉलीमर बैंक नोटों का पहले परीक्षण संभव; प्रिंटिंग लागत घटाने और नोटों की टिकाऊ क्षमता बढ़ाने पर जोर
₹10 और ₹20 के पॉलीमर बैंक नोटों का पहले परीक्षण संभव; प्रिंटिंग लागत घटाने और नोटों की टिकाऊ क्षमता बढ़ाने पर जोर
खबर खास | नई दिल्ली
देश में बढ़ती नकदी की मांग, करेंसी छापने की बढ़ती लागत और खराब हो चुके कागजी नोटों को बार-बार बदलने की जरूरत के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) एक बार फिर पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंक नोटों को पेश करने की तैयारी कर रहा है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो भारत धीरे-धीरे उन देशों की सूची में शामिल हो सकता है, जहां पॉलीमर करेंसी का इस्तेमाल किया जाता है।
डिजिटल पेमेंट के तेजी से विस्तार के बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, RBI जल्द ही पॉलीमर बैंक नोटों को लेकर एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा कर सकता है। पिछले 16 वर्षों में यह पॉलीमर करेंसी को लेकर RBI का तीसरा बड़ा प्रयास होगा।
शुरुआती चरण में इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत ₹10 और ₹20 के नोटों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की संभावना है। ये नोट सबसे ज्यादा चलन में रहते हैं और लगातार इस्तेमाल के कारण सबसे जल्दी खराब भी होते हैं। व्यापक स्तर पर पॉलीमर नोटों को लागू करने का फैसला पायलट प्रोजेक्ट की सफलता और जनता से मिलने वाली प्रतिक्रिया के आधार पर लिया जाएगा।
पारंपरिक कॉटन आधारित कागजी करेंसी के विपरीत पॉलीमर बैंक नोट एक विशेष प्रकार के प्लास्टिक सब्सट्रेट से बनाए जाते हैं। हालांकि इन्हें आमतौर पर ‘प्लास्टिक नोट’ कहा जाता है, लेकिन ये हल्के, लचीले होते हैं और इन्हें पारंपरिक कागजी नोटों की तरह मोड़ा और इस्तेमाल किया जा सकता है।
पॉलीमर नोट अधिक टिकाऊ होते हैं और गंदगी, नमी तथा फटने से बेहतर तरीके से बचाव करते हैं। इनमें पारदर्शी विंडो, माइक्रो-ऑप्टिक होलोग्राम, विशेष सुरक्षा स्याही और नकली नोटों की रोकथाम के लिए उन्नत तकनीक जैसी आधुनिक सुरक्षा सुविधाएं भी शामिल की जा सकती हैं। इससे इन नोटों की जालसाजी करना काफी मुश्किल हो जाता है।
पॉलीमर करेंसी में आरबीआई की नए सिरे से बढ़ती दिलचस्पी ऐसे समय में सामने आई है, जब करेंसी प्रबंधन की लागत तेजी से बढ़ रही है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में बैंक नोटों की छपाई पर खर्च बढ़कर ₹6,372.8 करोड़ हो गया, जो इससे पिछले वित्त वर्ष में ₹5,101.4 करोड़ था। इसी अवधि के दौरान करीब 23.8 अरब गंदे और खराब हो चुके बैंक नोटों को चलन से बाहर कर नष्ट किया गया। इनमें ₹500 और ₹100 के नोटों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही।
केंद्रीय बैंक का मानना है कि खासतौर पर अधिक इस्तेमाल होने वाले कम मूल्य वाले नोटों में पॉलीमर करेंसी शुरू करने से नोटों की उम्र काफी बढ़ाई जा सकती है। इससे पुराने नोटों को बार-बार बदलने की लागत कम हो सकती है और नकली नोटों के खिलाफ सुरक्षा भी मजबूत होगी।
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