पंजाब विधानसभा की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, दवा के दुरुपयोग और अवैध नशा मुक्ति केंद्रों पर सख्त कार्रवाई की सिफारिश
पंजाब विधानसभा की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, दवा के दुरुपयोग और अवैध नशा मुक्ति केंद्रों पर सख्त कार्रवाई की सिफारिश
खबर खास | चंडीगढ़
पंजाब सरकार के "युद्ध नशों विरुद्ध" (War Against Drugs) अभियान के बीच पंजाब विधानसभा की 129वीं सरकारी कार्य समिति (Government Business Committee) की रिपोर्ट ने नशा मुक्ति व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य की जेलों, सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों और अस्पतालों में बुप्रेनॉर्फिन (Buprenorphine) दवा की बड़े पैमाने पर खरीद और इस्तेमाल किया जा रहा है।
समिति ने चिंता जताई है कि जिस दवा का उद्देश्य लोगों को हेरोइन, स्मैक और अफीम जैसे नशों से छुटकारा दिलाना है, कहीं वही दवा लंबे समय में नई निर्भरता (Addiction) का कारण तो नहीं बन रही।
पंजाब हेल्थ सिस्टम्स कॉरपोरेशन (PHSC) द्वारा समिति के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 2 मिलीग्राम बुप्रेनॉर्फिन टैबलेट की खरीद लगातार बढ़ी है।
| वर्ष | खरीदी गई गोलियां |
|---|---|
| 2022 | 7 करोड़ |
| 2023 | 9.44 करोड़ |
| 2024 | 10 करोड़ |
| 2025 | 11 करोड़ |
| 2026 (जुलाई तक) | 6 करोड़ |
इस प्रकार 2022 से जुलाई 2026 तक कुल 43 करोड़ से अधिक गोलियां खरीदी जा चुकी हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी नशा मुक्ति कार्यक्रमों में पंजीकृत मरीजों की संख्या भी 2022 में लगभग 2 लाख से बढ़कर 2026 में 3.17 लाख से अधिक हो गई है, जिससे उपचार सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है।
समीक्षा बैठक के दौरान PHSC अधिकारियों ने समिति को बताया कि बुप्रेनॉर्फिन एक लंबी अवधि की मेंटेनेंस दवा है, जो मधुमेह जैसी पुरानी बीमारियों की दवाओं की तरह कई मरीजों को लंबे समय तक लेनी पड़ सकती है, ताकि वे दोबारा नशे की ओर न लौटें।
हालांकि, विधानसभा समिति ने इस तर्क पर कड़ी आपत्ति जताई। समिति का कहना था कि यदि मरीजों को अनिश्चितकाल तक यही दवा लेनी पड़े, तो इससे एक नशे की जगह दूसरी निर्भरता विकसित होने का खतरा पैदा हो सकता है। समिति ने कहा कि यदि बड़ी संख्या में मरीज पूरी तरह नशामुक्त होने के बजाय केवल बुप्रेनॉर्फिन पर निर्भर रह जाएं, तो पंजाब को नशामुक्त बनाने का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक खुलासा यह है कि कुछ मरीज कथित रूप से बुप्रेनॉर्फिन की गोलियों को पानी में घोलकर सिरिंज के जरिए नसों में इंजेक्ट कर रहे हैं।
समिति ने चेतावनी दी कि ऐसा करने से गंभीर संक्रमण, अंगों को नुकसान, ओवरडोज और यहां तक कि मौत का भी खतरा बढ़ सकता है। इसलिए सरकारी और निजी दोनों प्रकार के नशा मुक्ति केंद्रों में दवा वितरण और मरीजों की निगरानी को और सख्त बनाने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में अमृतसर समेत कई जिलों में बिना अनुमति संचालित निजी नशा मुक्ति केंद्रों का भी उल्लेख किया गया है। समिति के अनुसार, कई केंद्र आवासीय इमारतों और निजी परिसरों से बिना वैध लाइसेंस, विशेषज्ञ डॉक्टरों या आवश्यक प्रमाणपत्रों के संचालित हो रहे हैं।
समिति ने यह भी सवाल उठाया कि ऐसे केंद्र नियंत्रित दवा बुप्रेनॉर्फिन कैसे प्राप्त कर रहे हैं।
अधिकारियों ने समिति को बताया कि दवाओं की निगरानी और ट्रेसिंग को बेहतर बनाने के लिए नया डिजिटल पोर्टल शुरू किया गया है तथा लाइसेंस प्राप्त आपूर्तिकर्ताओं के लिए सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस (Certificate of Analysis) अनिवार्य कर दिया गया है।
समिति ने राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं—
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बुप्रेनॉर्फिन का उपयोग दुनिया के कई देशों में ओपिऑयड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी के तहत सफलतापूर्वक किया जाता है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह नियमित निगरानी, काउंसलिंग, पुनर्वास सेवाओं और नियंत्रित उपचार प्रणाली पर निर्भर करती है।
विधानसभा समिति की रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि पंजाब को अब उपचार के परिणामों, निगरानी व्यवस्था और पुनर्वास प्रणाली की व्यापक समीक्षा करने की आवश्यकता है।
राज्य में नशे की समस्या पहले से ही सामाजिक और राजनीतिक रूप से गंभीर मुद्दा बनी हुई है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि यह रिपोर्ट पंजाब विधानसभा में मौजूदा नशा मुक्ति नीति और उसकी प्रभावशीलता पर व्यापक चर्चा का आधार बनेगी।
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