"नौकरी मिलने से मुझे हर सुबह उठने की एक वजह मिली," स्वस्थ हो चुके युवक ने कहा। मुख्यमंत्री भगवंत मान सरकार का नशा विरोधी अभियान अब पूर्व नशा पीड़ितों को रोजगार और नई उम्मीद देकर उनका जीवन संवार रहा है।
"नौकरी मिलने से मुझे हर सुबह उठने की एक वजह मिली," स्वस्थ हो चुके युवक ने कहा। मुख्यमंत्री भगवंत मान सरकार का नशा विरोधी अभियान अब पूर्व नशा पीड़ितों को रोजगार और नई उम्मीद देकर उनका जीवन संवार रहा है।
खबर खास | चंडीगढ़
मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में चलाया जा रहा पंजाब सरकार का महत्वाकांक्षी ‘नशों के खिलाफ युद्ध’ (War Against Drugs) अभियान अब केवल नशा विरोधी मुहिम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पुनर्वास, आत्मनिर्भरता और नई उम्मीद का एक जन आंदोलन बनता जा रहा है।
राज्यभर में कई ऐसे युवा, जो कभी नशे की लत से जूझ रहे थे, अब स्थायी रोजगार और आत्मनिर्भरता के माध्यम से अपनी जिंदगी को नई दिशा दे रहे हैं।
मार्च 2025 में इस अभियान की शुरुआत के बाद से सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों में सफलतापूर्वक उपचार प्राप्त करने वाले अनेक लोगों को होटल, रेस्तरां, शॉपिंग मॉल, रिटेल चेन, डिलीवरी सेवाओं और अन्य निजी संस्थानों में रोजगार मिला है। वहीं कई लोगों ने स्वरोजगार का रास्ता भी अपनाया है, जिससे उनका सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास संभव हो सका है।
ऐसे ही एक लाभार्थी दलजिंदर सिंह (बदला हुआ नाम) ने पुनर्वास पूरा करने के बाद फरवरी 2026 में डी-मार्ट के एक आउटलेट में नौकरी शुरू की। आज वह आत्मविश्वास और उद्देश्य के साथ अपनी जिंदगी को फिर से संवार रहे हैं।
उन्होंने कहा, "नौकरी मिलने से मुझे हर सुबह उठने की एक वजह मिली। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। अब जिंदगी अच्छी लगती है। सुबह की एक साधारण चाय भी चेहरे पर मुस्कान ले आती है।"
एक अन्य स्वस्थ हो चुके युवक प्रवीण ढल्ल, जो वर्तमान में एक क्विक-कॉमर्स डिलीवरी प्लेटफॉर्म के साथ काम कर रहे हैं, मानते हैं कि रोजगार ने उन्हें नशे से दूर रहने में सबसे अधिक मदद की है।
उन्होंने कहा, "पुनर्वास ने मुझे बचाया, लेकिन नौकरी ने मुझे दोबारा जीना सिखाया। जब मैंने कमाना शुरू किया, तो मैंने खुद को केवल एक नशा छोड़ने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और भविष्य वाले इंसान के रूप में देखना शुरू किया। यही भावना मुझे नशे से दूर रखती है।"
यह अभियान केवल चिकित्सा उपचार तक सीमित नहीं है। जालंधर के नशा मुक्ति केंद्र में अधिकारी नियमित रूप से स्वस्थ हो चुके मरीजों की निगरानी करते हैं, ताकि उनकी प्रगति पर नजर रखी जा सके और दोबारा नशे की ओर लौटने के किसी भी संकेत की पहचान की जा सके।
फॉलो-अप मूल्यांकन में पाया गया है कि कई लाभार्थी सफलतापूर्वक रोजगार से जुड़े हुए हैं, जो यह दर्शाता है कि दीर्घकालिक पुनर्वास में आजीविका की महत्वपूर्ण भूमिका है।
कार्यक्रम से जुड़ी काउंसलरों का मानना है कि रोजगार न केवल दोबारा नशे की लत में जाने से रोकता है, बल्कि आत्मसम्मान को भी पुनर्स्थापित करता है।
अमृतसर मेडिकल कॉलेज स्थित स्वामी विवेकानंद ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर की काउंसलर भावना शर्मा ने कहा कि नशे से मुक्ति केवल नशा छोड़ने तक सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा, "हम मरीजों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने, जीवन को दोबारा संवारने और भविष्य के लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रेरित करते हैं। जब उन्हें रोजगार और स्थिर जीवन की राह दिखाई देती है, तो वे नशे से दूर रहने के लिए और अधिक प्रतिबद्ध हो जाते हैं।"
‘युद्ध नशेयां विरुद्ध’ पहल के तहत जालंधर नशा मुक्ति केंद्र के नोडल मनोचिकित्सक डॉ. अभय राज सिंह ने कहा कि ये सफलता की कहानियां इस बात को रेखांकित करती हैं कि नशा मुक्ति उपचार को पुनर्वास और रोजगार सहायता के साथ जोड़ना कितना जरूरी है।
उन्होंने कहा, "हर वह व्यक्ति जो नशे से उबरकर दोबारा काम पर लौटता है, केवल अपनी व्यक्तिगत जीत हासिल नहीं करता, बल्कि वह अपने परिवार को मजबूत और समाज को अधिक सुरक्षित बनाता है।"
जैसे-जैसे अधिक लाभार्थी उपचार केंद्रों से निकलकर रोजगार और स्वरोजगार की ओर बढ़ रहे हैं, पंजाब के ‘नशों के खिलाफ युद्ध’ अभियान की सफलता अब केवल ड्रग्स की बरामदगी और गिरफ्तारियों से नहीं, बल्कि पुनर्स्थापित जीवन, पुनर्निर्मित आजीविका और सुरक्षित भविष्य से भी मापी जा रही है।
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