सिंचाई मंत्री ने कहा कि राजस्थान सतलुज, रावी और ब्यास नदियों का तटीय राज्य नहीं है; प्रस्ताव में उझ बहुउद्देशीय परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने और पंजाब के जल विवाद पर जल्द फैसला लेने की मांग भी की गई।
सिंचाई मंत्री ने कहा कि राजस्थान सतलुज, रावी और ब्यास नदियों का तटीय राज्य नहीं है; प्रस्ताव में उझ बहुउद्देशीय परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने और पंजाब के जल विवाद पर जल्द फैसला लेने की मांग भी की गई।
पंजाब के सिंचाई मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने सोमवार को राजस्थान को दशकों से दिए जा रहे पानी का भुगतान पंजाब को करने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि राजस्थान सतलुज, रावी और ब्यास नदियों का तटीय राज्य नहीं है। पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र के अंतिम दिन उन्होंने इस मुद्दे पर प्रस्ताव पेश किया।
गोयल ने कहा कि पंजाब दशकों से राजस्थान को मुफ्त में पानी देता आ रहा है, जबकि राज्य खुद गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि राजस्थान इस पानी से राजस्व अर्जित कर रहा है, इसलिए उसकी सरकार को पंजाब को पानी की आपूर्ति का भुगतान करना चाहिए। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से यह सुनिश्चित करने की मांग भी की गई कि भविष्य में राजस्थान पंजाब से प्राप्त पानी के बदले हर साल भुगतान करे।
सिंचाई मंत्री ने कहा कि रावी नदी के रास्ते पाकिस्तान जाने वाले पानी में उझ, तरनाह और बसंतर नदियों का पानी भी शामिल है। ये नदियां जम्मू-कश्मीर से निकलती हैं और माधोपुर हेडवर्क्स के नीचे रावी नदी में मिलती हैं। उन्होंने बताया कि पंजाब के पास इस पानी को संग्रहित करने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा नहीं है।
प्रस्ताव में केंद्र सरकार से उझ बहुउद्देशीय परियोजना का निर्माण प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने का आग्रह किया गया, ताकि इस पानी को रणजीत सागर बांध की ओर मोड़कर पंजाब में सिंचाई और अन्य जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
गोयल ने यह भी कहा कि यमुना नदी के पानी पर पंजाब के ऐतिहासिक और कानूनी अधिकार हैं। उन्होंने तर्क दिया कि वर्ष 1966 में पंजाब के पुनर्गठन से पहले यमुना नदी अविभाजित पंजाब से होकर बहती थी।
प्रस्ताव में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से 25 अप्रैल, 2025 को पंजाब की ओर से दायर शिकायत पर जल्द फैसला लेने और जल विवाद न्यायाधिकरण गठित करने की मांग की गई। इसमें यह भी कहा गया कि यदि केंद्र सरकार फैसला लेने में देरी करती है, तो पंजाब सरकार को सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना चाहिए।

वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने एक अन्य प्रस्ताव पेश किया। इसमें कहा गया कि राज्य की प्रमुख कल्याणकारी योजनाएं जारी रहेंगी और इनके लिए पंजाब के बजट में प्रावधान किया जाएगा।
इन योजनाओं में मुख्यमंत्री मावां-धियां सत्कार योजना, हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली, कृषि क्षेत्र के लिए मुफ्त बिजली, मुख्यमंत्री सेहत योजना, आम आदमी क्लीनिक, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, तीर्थयात्रा योजना और डेयरी क्षेत्र से जुड़ी वित्तीय सहायता योजनाएं शामिल हैं।
प्रस्ताव में इन योजनाओं को लेकर कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल की ओर से की गई टिप्पणियों की निंदा भी की गई।
आम आदमी पार्टी के विधायक कुलवंत सिंह ने नर्सरी और लोअर किंडरगार्टन (एलकेजी) के विद्यार्थियों को मिड-डे मील उपलब्ध कराने का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि फिलहाल यह योजना अपर किंडरगार्टन (यूकेजी) से लेकर आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को कवर करती है।
उन्होंने कहा कि नर्सरी और एलकेजी के बच्चे भी अन्य विद्यार्थियों के साथ कक्षाओं में पढ़ते हैं, लेकिन उन्हें मिड-डे मील नहीं मिलता। उनके अनुसार, दोपहर के भोजन के समय कुछ कक्षाओं की छुट्टी कर दी जाती है, जबकि योजना के दायरे में आने वाले विद्यार्थियों को खाना खाने के लिए बुलाया जाता है।
इस मुद्दे पर जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि प्री-प्राइमरी शिक्षा व्यवस्था को पुनर्गठित करके प्री-प्राइमरी-1 और प्री-प्राइमरी-2 में बांटा गया है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के नियमों में बदलाव के कारण योजना लागू करने में कठिनाइयां पैदा हुई हैं।
मंत्री ने समझाया कि पहले केंद्र सरकार राज्य सरकार की ओर से अपना हिस्सा देने से पहले ही केंद्रीय हिस्से की राशि जारी कर देती थी। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार सभी बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्रयास कर रही है।
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