‘बंटवारा 1947’ के कमजोर प्रदर्शन से निराश हैं शबाना आजमी, अमिताभ बच्चन की ‘कुली’ का उदाहरण देकर पूछा—क्या फिल्मों में धार्मिक पहचान को लेकर बदल गया है नजरिया?
‘बंटवारा 1947’ के कमजोर प्रदर्शन से निराश हैं शबाना आजमी, अमिताभ बच्चन की ‘कुली’ का उदाहरण देकर पूछा—क्या फिल्मों में धार्मिक पहचान को लेकर बदल गया है नजरिया?
बॉलीवुड में इन दिनों फिल्मों की कहानी और बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के साथ-साथ कलाकारों के किरदारों को लेकर भी नई बहस छिड़ गई है। दिग्गज अभिनेत्री शबाना आजमी ने सनी देओल की फिल्म ‘बंटवारा 1947’ के प्रदर्शन पर निराशा जताते हुए एक ऐसा सवाल उठाया है, जिसने हिंदी सिनेमा में धार्मिक पहचान और कलाकारों की भूमिकाओं को लेकर चर्चा तेज कर दी है। शबाना ने सवाल किया कि आखिर दर्शक सनी देओल को मुस्लिम किरदार में स्वीकार करने में क्यों हिचक रहे हैं?
सनी देओल स्टारर ‘बंटवारा 1947’ को समीक्षकों और दर्शकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है। फिल्म की रिलीज इमरान हाशमी की ‘आवारापन 2’ के साथ हुई थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म ‘आवारापन 2’ की सफलता के करीब भी नहीं पहुंच सकी। खास बात यह है कि दोनों फिल्मों में शबाना आजमी ने अहम भूमिका निभाई है। जहां वह ‘आवारापन 2’ की सफलता से खुश हैं, वहीं ‘बंटवारा 1947’ के कमजोर प्रदर्शन ने उन्हें निराश किया है।
शबाना आजमी ने फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन पर हैरानी जताते हुए कहा कि उनके आसपास ऐसे कई लोग हैं, जो फिल्म देखने के बाद इसकी तारीफ कर रहे हैं और उन्हें इसका संदेश भी पसंद आया। इसके बावजूद फिल्म को सिनेमाघरों में अपेक्षित दर्शक नहीं मिले। उन्होंने कहा कि जो लोग फिल्म देखने पहुंचे, उनकी प्रतिक्रिया भी मिली-जुली रही।
इसी सिलसिले में शबाना आजमी ने सनी देओल के मुस्लिम किरदार को लेकर सवाल खड़ा किया। उन्होंने अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘कुली’ का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौर में अमिताभ बच्चन ने मुस्लिम किरदार निभाया था और दर्शकों ने उसे सहजता से स्वीकार किया था। उनके मुताबिक, किरदार की धार्मिक पहचान को लेकर उस समय इस तरह का सवाल नहीं उठाया जाता था।
शबाना ने सवाल किया कि क्या मौजूदा माहौल ऐसा बन गया है, जहां किसी कलाकार को उसकी वास्तविक छवि से अलग धार्मिक पहचान वाले किरदार में स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या फिल्मों में इस तरह का भेदभाव जानबूझकर बढ़ रहा है।
अभिनेत्री ने भारत-पाकिस्तान विभाजन जैसे विषयों को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की। उनका कहना था कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान अब हिंदी सिनेमा में ऐसा विषय बनता जा रहा है, जिसे छूना भी मुश्किल माना जाने लगा है। शबाना के मुताबिक, यह निराशाजनक स्थिति है, खासकर तब जब ‘बंटवारा 1947’ जैसी फिल्म राजनीतिक रूप से किसी खास विचारधारा के पक्ष में खड़ी नहीं होती।
उन्होंने फिल्म में सनी देओल के अभिनय की भी तारीफ की। शबाना ने खास तौर पर उनके साथ फिल्माए गए भावनात्मक दृश्यों का जिक्र करते हुए कहा कि अभिनय के दौरान उन्हें वास्तव में ऐसा महसूस हुआ कि सनी का किरदार उस बुजुर्ग महिला की परवाह करता है। इसके बावजूद फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता नहीं मिलना उनके लिए निराशाजनक और विरोधाभासी है।
‘बंटवारा 1947’ का बॉक्स ऑफिस सफर ‘आवारापन 2’ के मुकाबले काफी कमजोर रहा। फिल्म ने रिलीज के पहले दिन करीब 5.75 करोड़ रुपये का कारोबार किया था। पहले सप्ताह में इसका कलेक्शन लगभग 33.60 करोड़ रुपये रहा, जबकि अब तक फिल्म का कुल कारोबार करीब 37.70 करोड़ रुपये बताया गया है। इसके मुकाबले ‘आवारापन 2’ ने करीब 145.45 करोड़ रुपये का कुल कलेक्शन किया है।
विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी ‘बंटवारा 1947’ उर्दू नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या ओ जम्याई नई’ से प्रेरित है। फिल्म में सनी देओल के अलावा प्रीति जिंटा, करण देओल और कनिका कपूर भी अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म का निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया है, जबकि आमिर खान इसके निर्माता हैं। फिल्म 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी।
दोनों फिल्मों में शबाना आजमी की भूमिकाएं भी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं। ‘आवारापन 2’ में उन्होंने एक डॉन का किरदार निभाया, जबकि ‘बंटवारा 1947’ में वह एक बुजुर्ग महिला के रूप में नजर आईं। ऐसे में दोनों फिल्मों की रिलीज और उनके अलग-अलग प्रदर्शन ने शबाना आजमी को हिंदी सिनेमा के मौजूदा दर्शक नजरिए पर सवाल उठाने का एक मौका दिया है।
शबाना का यह सवाल अब सिर्फ एक फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके जरिए उन्होंने यह बहस छेड़ दी है कि क्या हिंदी सिनेमा में कलाकारों को उनकी स्थापित छवि से बाहर जाकर अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक किरदारों में स्वीकार करने की दर्शकों की सोच बदल रही है।
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