उन्होंने कहा प्रयागराज हमेशा से आस्था और शांति की धरती रही है। श्रद्धा के साथ यहां आया था, लेकिन एक ऐसी घटना हो गई, जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी।
उन्होंने कहा प्रयागराज हमेशा से आस्था और शांति की धरती रही है। श्रद्धा के साथ यहां आया था, लेकिन एक ऐसी घटना हो गई, जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी।
खबर खास, प्रयागराज :
''बिना स्नान दुखी मन से लौट रहा हूं, इसकी कल्पना नहीं की थी' यह कहते हुए ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज माघ मेला छोड़ दिया है। इसके बाद वह काशी के लिए रवाना हो गए हैं। इससे पूर्व उन्होंने सुबह पत्रकारों से बातचीत में कहा कि आज मन इतना व्यथित है कि हम बिना स्नान किए ही विदा ले रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस दुख की भरपाई पता नहीं कौन सा नेता आएगा कौन सी पार्टी आएगी जो करेगी। प्रयागराज हमेशा से आस्था और शांति की धरती रही है। श्रद्धा के साथ यहां आया था, लेकिन एक ऐसी घटना हो गई, जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी।
शकंराचार्य ने कहा कि कल मुझे माघ मेला प्रशासन की ओर से एक पत्र और प्रस्ताव भेजा गया। इसमें कहा कि मुझे पूरे सम्मान के साथ पालकी से संगम ले जाकर स्नान कराया जाएगा। मुझ पर फूल बरसाए जाएंगे, लेकिन मैंने प्रस्ताव को ठुकरा दिया। जब दिल में दुख और गुस्सा हो, तो पवित्र पानी भी शांति नहीं दे पाता।
गौर रहे कि यह माघ मेला 15 फरवरी तक चलेगा और अभी दो स्नान बचे हैं। माघी पूर्णिमा (1 फरवरी) और महाशिवरात्रि (15 फरवरी)। लेकिन विवाद के कारण शंकराचार्य ने माघ मेला 18 दिन पहले ही छोड़ दिया। मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य का प्रशासन से विवाद हुआ, फिर वे बिना स्नान किए लौट गए। इसके बाद उन्होंने बसंत पंचमी के दिन भी स्नान नहीं किया था। अब वे बाकी दोनों स्नान में भी शामिल नहीं होंगे।
शंकराचार्य ने कहा कि इस घटना ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया। इससे न्याय और मानवता के प्रति मेरा विश्वास कमजोर हुआ है। मैंने कुछ समय का मौन रखकर प्रार्थना भी की कि जिन लोगों ने अपमान किया है, उन्हें दंड मिले। मेरे सम्मान को ठेस पहुंचाने का प्रयास हुआ। इसके पीछे राज्य सरकार जिम्मेदार है।
उन्होंने कहा कि प्रशासन के कल के प्रस्ताव में मौनी अमावस्या की घटना के लिए माफी नहीं मांगी गई। असली सम्मान तब होता है, जब गलती मानी जाए और सच्चे मन से माफी मांगी जाए। जब तक मूल घटना की जिम्मेदारी लेकर दोषी लोग माफी नहीं मांगते, तब तक ऐसे किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करूंगा। अगर मैं उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता, तो उस दिन हुई घटना और उनके भक्तों के अपमान का मुद्दा दब जाता। उन्होंने कहा कि 'मैं इस मामले को लेकर कई दिनों तक विरोध में बैठा रहा, लेकिन फिर मेला छोड़ने का फैसला किया। अगर पहले पालकी से स्नान कराना गलत माना गया, तो अब वही बात सही कैसे हो गई? क्या संतों, संन्यासियों और ब्रह्मचारियों के साथ हुई मारपीट और अपमान की भरपाई ऐसे ही कर दी जाएगी?'
स्वामी जी ने कहा, 'मैं इस तरह के दिखावे वाले सम्मान को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। किसकी जीत हुई और किसकी हार हुई, यह समय बताएगा। फैसला सनातनी समाज करेगा। जो मुगलों के समय हुआ था, वही आज हो रहा है। इन 11 दिनों में हमारी प्रतिष्ठा की हत्या का प्रयास हुआ।'
उन्होंने कहा कि 'अगर यह केवल स्थानीय प्रशासन करता, तो बात अलग होती, लेकिन इसके पीछे उत्तर प्रदेश का शासन है। हमने पहले भी कहा था कि इस अन्याय के प्रतिकार के लिए आगे भी आंदोलन किया जाएगा। अगर सनातनी चाहेंगे, तो हम शांत नहीं बैठेंगे। मेरी युवाओं से अपील है कि जिन्होंने सनातनी प्रतीकों का अपमान किया है, उन्हें उनकी औकात दिखानी होगी।'
क्यों हुआ सारा विवाद...
गौर रहे कि 18 जनवरी को माघ मेले में स्नान करने जा रहे शंकराचार्य की पालकी को पुलिस ने रोका। इसके विरोध में उनकके शिष्यों से धक्का-मुक्की की घटना भी हुई और बटुकों व साधुओं की शिखा पकड़कर घसीटने और उनसे मारपीट कर जूतों तले कुचलने और उनके कपड़े फाड़ने सरीखी घटनाएं हुई जिसके बाद शंकराचार्य शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। 11दिनों से शिविर में प्रवेश नहीं किया। इसके बाद प्रशासन ने हद पार करते हुए शंकराचार्य को दो दिनों में दो नोटिस जारी करते हुए उनके शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा। जिसका जवाब शंकराचार्य ने दे दिया। लेकिन यूपी के सीएम योगी ने बिना नाम लिए कालनेमि का जिक्र किया जिससे विवाद और गहरा गया। इसके जवाब में शंकराचार्य ने योगी की तुलना कालनेमि और औरंगजेब से कर दी।
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