अदालत ने कहा, अभियोजन पक्ष के पास ठोस व विश्वसनीय सबूतो की कमी गौतम चीमा पर क्रिस्पी खैहरा को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाने का था आरोप कमजोर सबूत, हिरासत साबित करने में नाकाम रहा अभियोजन
अदालत ने कहा, अभियोजन पक्ष के पास ठोस व विश्वसनीय सबूतो की कमी गौतम चीमा पर क्रिस्पी खैहरा को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाने का था आरोप कमजोर सबूत, हिरासत साबित करने में नाकाम रहा अभियोजन
खबर खास, मोहाली/चंडीगढ़ :
एसएएस नगर मोहाली की विशेष सीबीआई अदालत ने एक हाई प्रोफाइल व 2014 के मोहाली पुलिस स्टेशन घटना मामले में आईजी गौतम चीमा समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने 20 दिसंबर 2024 के पहले दिए गए दोषसिद्धि आदेश को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के पास ठोस और विश्वसनीय सबूतों की कमी है और उसके मामले में गंभीर विरोधाभास हैं। विशेष न्यायाधीश बलजिंदर सिंह सरां ने इस मामले पर अपना फैसला दिया।
गौर रहे कि यह मामला 26 अगस्त 2014 का है, जब आरेाप लगाया गया था कि तब आईजी के पद पर तैनात गौतम चीमा नशे की हालत में फेज एक के पुलिस स्टेशन पहुंचे और कथित तौर पर घोषित अपराधी सुमेध गुलाटी को पुलिस हिरासत से जबरन छुड़वा कर ले गए थे। इसके साथ यह भी आरोप लगा था कि गुलाटी को मैक्स अस्पताल ले जाकर उनके साथ मारपीट की गई और एक मरीज क्रिस्पी खैहरा को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाया गया।
हालांकि सीबीआई कोर्ट में ट्रायल और अपील के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी टिक नहीं पाई। अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारियों, कथित पीड़ितों समेत किसी भी गवाह ने अदालत में गौतम चीमा या अन्य आरोपियों की पहचान ही नहीं की थी। इतना ही नहीं कई गवाह अपने पहले के दिए बयानों पर नहीं टिके और मुकर गए या फिर घटना से ही इनकार कर दिया।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि सुमेध गुलाटी कभी कानूनी रूप से पुलिस हिरासत में था, जिससे उसे कथित रूप से छुड़ाया गया। अहम गवाहों, जैसे एएसआई दिलबाग सिंह की गवाही में गंभीर विरोधाभास पाए गए और इस बात का कोई विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण भी पेश नहीं किया गया कि घटना के समय गुलाटी पुलिस स्टेशन में मौजूद था।
अदालत ने कहा कि जांच के दौरान फोटो पहचान पर निर्भर रहना कानूनी रूप से कमजोर है, खासकर जब टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई। बाद में गवाहों ने तस्वीरों के जरिए पहचान करने से भी इनकार कर दिया, जिससे अभियोजन का मामला और कमजोर हो गया। इसके अलावा डिजिटल सबूत जैसे सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) भी आरोपों को साबित नहीं कर सके। इन सबूतों का या तो सही तरीके से संग्रह नहीं किया गया या फिर भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी का पालन न होने के कारण उन्हें अदालत में मान्य नहीं माना गया। कुछ रिकॉर्ड तो यह भी संकेत देते हैं कि घटना के समय गौतम चीमा कथित स्थान पर मौजूद ही नहीं थे।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि सुमेध गुलाटी ने खुद अभियोजन की कहानी से इनकार करते हुए कहा कि उसे सीधे अस्पताल से गिरफ्तार किया गया था, न कि पुलिस हिरासत से किसी आरोपी द्वारा ले जाया गया।
अदालत ने अभियोजन के मामले को “अनुमान और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूतों से रहित” बताते हुए कहा कि आपराधिक कानून में केवल संदेह, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत का विकल्प नहीं हो सकता। अदालत के अनुसार सबूतों की कड़ी अधूरी रही और आरोप साबित नहीं हो सके।
इसी आधार पर अदालत ने गौतम चीमा और अन्य सभी आरोपियों को आईपीसी की धाराओं 120-बी, 186 और 225 के तहत संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। यह फैसला एक ऐसे हाई-प्रोफाइल मामले में जांच और अभियोजन की गंभीर खामियों को उजागर करता है।
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