सतलुज से सिल्ट निकालने को हिमाचल ने भी दी हरी झंडी, मिलेगी तगड़ी रायल्टी; इससे निकली रेत से बीबीएमबी व सहभागी राज्यों की बढ़ेगी कमाई; पहले एक साल के लिए होगा पायलट प्रोजेक्ट
सतलुज से सिल्ट निकालने को हिमाचल ने भी दी हरी झंडी, मिलेगी तगड़ी रायल्टी; इससे निकली रेत से बीबीएमबी व सहभागी राज्यों की बढ़ेगी कमाई; पहले एक साल के लिए होगा पायलट प्रोजेक्ट
अनुराधा शर्मा
खबर खास, चंडीगढ़ :
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में भाखड़ा बांध का उद्घाटन करते हुए इसे उभरते भारत के नए मंदिर की संज्ञा दी थी। लगभग 16 साल के लंबे अंतराल के बाद 245.28 करोड़ की लागत से बना यह बांध आज 62 साल बाद खतरे में है। इसका कारण है इसके तलाशय में तेजी से भर रही गाद है। लेकिन, अब राष्ट्र की ऊर्जा एवं सिंचाई व्यवस्था के आधार के तौर पर जाने जाते इस भाखड़ा बांध से पहली बार बड़े पैमाने पर डिसिल्टिंग यानि गाद निकालने को मंजूरी मिल गई है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इससे बांध के दीर्घकालिक संचालन व बाढ़ प्रबंधन क्षमताओं पर इसका सकारात्मक असर होगा।
चूंकि सतलुज में बढ़ी सिल्ट से डैम की उम्र तो घटने लगी ही थी, साथ ही उसके भंडारण की क्षमता भी तेजी से कम हो रही थी। अब हिमाचल सरकार ने सैद्धांतिक रूप से बीबीएमबी के प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने देने के बाद इसका मार्ग प्रशास्त हो गया है। चूंकि इस जलाशय का बड़ा हिस्सा हिमाचल के अधिकार क्षेत्र में आता है तो उसे इससे अच्छी कमाई होगी। बीबीएम के एक अधिकारी की मानें तो सतलुज से निकाले जानी वाली गाद यानि रेत पर हिमाचल सरकार को तय रॉयल्टी तो मिलेगी ही साथ ही बाकी की राशि बीबीएम व उसके सहयोगी राज्यों को दी जाएगी। इससे एक ओर तो गाद की समस्या हल होगी साथ ही कमाई में भी इजाफा होगा।
सूत्रों की मानें तो बीबीएमबी ने हिमाचल प्रदेश सरकार को बिलासपुर में एक उपयुक्त साइट चिन्हित कर सुझाव दिया है जहां साल के आठ से नौ महीने पानी का स्तर तो कम रहता ही है, साथ ही यहां खुदाई भी आसान है। यहां से रेत आसानी से ट्रकों में भरकर पूरे उत्तर भारत में सप्लाई की जा सकती है। इसके अलावा इलावा नदी में इतनी अधिक तलछट है कि हर वर्ष आठ से नौ महीनों तक चौबीस घंटे हजारों ट्रक तैनात रहने के बावजूद इसे साफ करने में वर्षों लग जाएगे। इसके अलावा बीबीएमबी ने एनएचएआई से भी आग्रह किया है कि सड़क निर्माण व जमीन को भरने में इसी गाद का प्रयोग किया जाए ताकि लागत तो घटे ही साथ ही सामग्री का भी उपयुक्त उपयोग हो।
भाखड़ा जलाशय, जिसे गोबिंद सागर झील के नाम से जाना जाता है, देश की सबसे बड़ी मानव निर्मित झीलों में से एक है। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर, बिलासपुर और ऊना जिलों में 88 वर्ग किलोमीटर में फैली इस झील की मूल भंडारण क्षमता 7.4 बिलियन क्यूबिक मीटर थी, जो गाद के कारण घटकर लगभग छह लाख बिलियन क्यूबिक मीटर रह गई है। जब बांध का निर्माण हुआ था, तब जलाशय में सालाना 33.61 मिलियन घन मीटर गाद आने की उम्मीद थी। लेकिन अब समय के साथ, शहरीकरण, वनों की कटाई, निर्माण गतिविधियों के कारण 61 वर्षों (1964-2025) में गाद का प्रवाह बढ़कर 39.01 बिलियन क्यूबिक मीटर हो गया है। जलाशय का भंडारण न्यूनतम 1,462 फीट और अधिकतम 1,680 फीट के बीच है।
हालांकि, ट्रैप की दक्षता भी 85 प्रतिशत से बढ़ाकर 99.4 प्रतिशत कर दी गई है। लाइव स्टोरेज घटकर 19 प्रतिशत और डेड स्टोरेज 47 प्रतिशत हो गया है। कुल मिलाकर लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा तलछट से भर गया है। इससे इसकी प्रभावी जल धारण क्षमता में उल्लेखनीय कमी आई है। हालांकि यह गाद डैम से अभी तक दस किलोमीटर दूर है, लेकिर साल-दर-साल यह खतरा नजदीक बढ़ता जा रहा है जिससे जल भंडारण क्षमता कम हो रही है।
विशेषज्ञों की मानें तो हिमाचल में सतलुज जलग्रहण क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों में वृद्धि, राजमार्गों का चार लेन का निर्माण, वनों की कटाई, प्राकृतिक कटाव आदि गाद की समस्या के मुख्य कारण हैं। गाद का प्रवाह विशेष रूप से 2003 से 2015 के बीच बढ़ा, जब बिलासपुर में सतलुज नदी पर कोल डैम का निर्माण किया जा रहा था और 2018-2022 के बीच बढ़ा, जब सड़कों को फोरलेन बनाया जा रहा था। इससे पहले पीएमजीएसवाई के तहत बनाई गई सड़कों ने भी स्थिति को बिगाड़ा था। इसके अतिरिक्त तेजी से हो रहे शहरीकरण भी इसका जिम्मेदार है। इन सबने सतलुज घाटी में सिल्ट प्रवाह को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया।
पहले एक साल के लिए लाया जाएगा पायलट प्रोजेक्ट
इस प्रोजेक्ट को लेकर हिमाचल विधानसभा में वहां की कांग्रेस की सुखविंदर सिंह सुक्खू नीत सरकार इसे उठा रही है जबकि केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने भी इस प्रक्रिया के लिए एक 10 सदस्यीय समिति का गठन किया है। यदि विधानसभा और केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी मिल जाती है, तो बीबीएमबी इसे एक साल का पायलट प्रोजेक्ट बनाएगा। इसके बाद मॉडल सफल रहा तो इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाएगा।
सर छोटू राम को माना जाता है भाखड़ा बांध का जनक
स्वतंत्रता पूर्व भारत के पंजाब प्रांत में एक प्रमुख भारतीय कृषि सुधारक, राजनीतिज्ञ और विचारक व पंजाब के तत्कालीन राजस्व मंत्री सर छोटू राम को भाखड़ा बांध का जनक माना जाता है। उन्होंने 1923 की शुरुआत में भाखड़ा बांध की संकल्पना की थी। बाद में, इस परियोजना के लिए सर छोटू राम ने नवंबर 1944 में बिलासपुर के राजा के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए और 8 जनवरी 1945 को परियोजना की योजना को अंतिम रूप दिया गया।
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