गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब से निकले पावन नगर कीर्तन में पंथक एकता और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला
गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब से निकले पावन नगर कीर्तन में पंथक एकता और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला
ख़बर खास, श्री फतेहगढ़ साहिब :
श्री फतेहगढ़ साहिब में शुक्रवार को हर वर्ष की तरह इस बार भी शहीदी नगर कीर्तन पूरे श्रद्धा, अनुशासन और पंथक एकता के साथ आयोजित किया गया। यह नगर कीर्तन दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबज़ादों—बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी—तथा माता गुजरी जी की शहादत की स्मृति को समर्पित रहा। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से पहुंचे संगतों ने भारी संख्या में भाग लेकर शहीदों को नमन किया।
नगर कीर्तन की अगुवाई श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज्ज ने की। उनके साथ ऐतिहासिक दमदमी टकसाल के प्रमुख बाबा हरनाम सिंह खालसा की विशेष उपस्थिति ने इस आयोजन को और भी गरिमामयी बना दिया। यह दृश्य सिख कौम की तख्ती और गुरमत विद्वत परंपरा के संगम का प्रतीक बना, जिसे संगतों ने अत्यंत भावुकता और सम्मान के साथ देखा।
गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब से प्रारंभ हुआ यह शहीदी नगर कीर्तन शबद कीर्तन, गुरबाणी उच्चारण और गुरु इतिहास के जयकारों के साथ आगे बढ़ा। पंज प्यारों की अगुवाई में चल रहे इस नगर कीर्तन में निहंग सिंह जत्थे, गुरमत प्रचारक, कीर्तनी जत्थे, गतका दल और विभिन्न सिख संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। पूरे मार्ग पर संगतों ने फूलों की वर्षा कर और “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” के जयघोष से वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
नगर कीर्तन के दौरान साहिबज़ादों और माता गुजरी जी की शहादत से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों का स्मरण किया गया। वक्ताओं ने बताया कि किस प्रकार छोटे साहिबज़ादों ने अत्याचारों के सामने झुकने से इनकार करते हुए धर्म और सच्चाई की रक्षा के लिए अल्पायु में ही सर्वोच्च बलिदान दिया। माता गुजरी जी की त्यागमयी भूमिका को भी विशेष रूप से याद किया गया, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी गुरसिखी मूल्यों को जीवित रखा।
सुरक्षा और प्रबंधों के लिहाज से आयोजन पूरी तरह सुव्यवस्थित रहा। सेवादारों द्वारा संगतों के लिए लंगर, जल और चिकित्सा सहायता की उचित व्यवस्था की गई थी। प्रशासन और गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के सहयोग से नगर कीर्तन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।
शहीदी नगर कीर्तन न केवल एक धार्मिक आयोजन रहा, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को साहिबज़ादों की कुर्बानी से प्रेरणा लेने का संदेश भी देता नजर आया। पूरे आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि सिख कौम आज भी अपने इतिहास, शहादत और गुरसिखी मूल्यों से गहराई से जुड़ी हुई है।
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